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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर- डॉ. दक्षा जोशी

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संपूर्ण विश्व में 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (International Women’s Day) मनाया जाता है। इसका अभिप्राय बिल्कुल भी नहीं है कि शेष 364 दिन आप इन्हें अलग कर दें बल्कि इस दिवस को मनाने का उद्देश्य नारी को उसके अधिकारों के प्रति प्रोत्साहित कर उसे सशक्त होने का अवसर प्रदान करना है ताकि वह ना केवल ख़ुद को सशक्त कर सके बल्कि उन्नत समाज के लिए महत्वपूर्ण योगदान दे सकें। सही मायनों में महिला दिवस का अर्थ सभी स्टूडेंट्स को समझना होगा तभी हमारा देश आगे बढ़ेगा।
हमारे भारतीय समाज के अतीत की बात की जाए तो लगभग हर जगह पुरुष प्रधान मानसिकता तत्कालीन समय में महिलाओं पर हावी रही ,जिससे उन्हें उपेक्षा, भेदभाव, लैंगिक, असमानता और शोषण का सामना करना पड़ा है। आज भी कहीं ना कहीं भारतीय समाज इन कुरीतियों से अछूता नहीं है। इतिहास की तरफ झांक कर देखा जाए तो महिलाओं की तत्कालीन दयनीय दशा का कारण समाज में व्याप्त पितृसत्तात्मक मानसिकता रही है ,जिन्होंने स्त्रियों का शोषण करने की परंपरा जमा ली। हैरानी की बात तब होती है जब स्त्री को भोगविलास की वस्तु बता कर अपनी मानसिकता का परिचय दिया गया ! इसी ग़लत मानसिकता के कारण तत्कालीन समय में स्त्रियों के प्रति नकारात्मक विचारों का जन्म होने लगा। स्त्री को सिर्फ़ घरेलू श्रमिक, उपभोग व मनोरंजन की वस्तु समझा गया।
इतनी सामाजिक बेड़ियो में बंधे होने के बावजूद भी महिलाओं ने पुरुषों के समक्ष अपने ज्ञान तथा विवेक का परिचय दिया है। जैसे- रजिया सुल्तान, देवी चौधरानी, रानी लक्ष्मीबाई, बेगम हजरतमहल, कदग्विनि गांगुली, सरोजनी नायडू, कैप्टन लक्ष्मी सहगल, मदर टेरेसा, इंदिरा गांधी आदि महिलाओ ने समाज के विकास के लिए पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अपना योगदान दिया है। इससे ज़ाहिर होता है कि अगर महिलाओं को भी सशक्त बनाया जाए तो वह भी समाज में अच्छे कार्यों के लिए योगदान जरूर दे सकती हैं। आज समाज में ऐसे वातावरण की आवश्यकता है ,जिसमें सरकारी व ग़ैर सरकारी प्रयासों से देश और समाज को ख़ुशहाल और समृद्ध बनाया जा सके । सदियों से चली आ रही इस रूढ़िवादी परंपराओं को तोड़ना होगा। महिलाओं को शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में संगठित होकर अपने अधिकारों के प्रति जागरूक कर सभी क्षेत्रों में उनकी भागीदारी के स्तर में वृद्धि करने पर ही महिलाएं सशक्त होगी और तभी समाज मजबूत होगा और राष्ट्र निर्माण होगा।
भारत में महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए सबसे पहले समाज में उनके अधिकारों और मूल्यों को मारने वाली उन बुरी सोचों को ख़त्म करना होगा जो महिला सशक्तिकरण के लिए रुकावट हैं। जैसे दहेज प्रथा, महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा, यौन हिंसा, अशिक्षा, कन्या भ्रूण हत्या, असमानता, बाल मजदूरी, यौन शोषण, वेश्यावृत्ति इत्यादि।
देश की आज़ादी के बाद भारत को बहुत सी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है जिससे शिक्षा के क्षेत्र में पुरुष और महिलाओं के बीच एक बड़ा अंतर पैदा हुआ है। महिला को उनके सामाजिक और मौलिक अधिकार जन्म से ही मिलना चाहिए। महिला सशक्तिकरण तब माना जा सकता है जब महिला को यह निम्नलिखित अधिकार दिए जाएं-
-वह अपना जीवन ,अपने अनुसार ,स्वतंत्र जीवन जी सकती है चाहे वह घर हो या बाहर।
-किसी भी प्रकार से शिक्षा प्रदान करते समय उन में भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए।
-सभी क्षेत्रों में पुरुष और महिला को बराबरी में लाना बहुत ही ज़रूरी है।
-वह घर पर या बाहर काम के स्थान, सड़क आदि पर सुरक्षित आ जा सके,ताकि निर्भया, लक्ष्मी या ग्रीष्मा जैसी परिस्थितियों से बच सकें ।
-उसे एक आदमी की तरह समाज में समान अधिकार मिलना चाहिए।
-महिलाओं के प्रति लोगों के मन में सम्मान की भावना होनी चाहिए।
-वह अपना निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र महसूस करती हो।

हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी ने कहा था कि-
“जब तक हमारे देश की महिलाएं पुरुषों के साथ एक साथ मिलकर काम नहीं करेंगी तब तक हमारे देश का पूरी तरह से विकास नहीं होगा।”
पिछले कुछ वर्षों में हमें महिला सशक्तिकरण का कुछ फ़ायदा मिल रहा है। महिलाएं अपने स्वास्थ्य, शिक्षा, नौकरी तथा परिवार, देश और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को लेकर ज्यादा सचेत रहती हैं। वह हर क्षेत्र में भाग लेती है, और अपनी रुचि प्रदर्शित करती है। 
अंततः कई वर्षों के संघर्ष के बाद उन्हें सही राह पर चलने के लिए उनका अधिकार मिल रहा है। आज महिलाओं ने कई दिग्गज काम कर के साबित कर दिया है कि वे केवल पुरुषों के बराबर ही नहीं ,पुरुषों से भी आगे हैं। जो घर संभालने के साथ-साथ बाहरी दुनिया में भी अपना नाम रोशन कर रहे हैं।
कल्पना चावल, इंद्रा नुई, मेरी कॉम, प्रियंका चोपड़ा, मिताली राज जैसी महिलाओं ने सफलताओं को छु कर न सिर्फ़ भारत बल्कि पूरे विश्व की महिलाओं को सशक्त बनने के लिए उत्साहित किया है।
अस्तु ।

-डॉ .दक्षा जोशी ।