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महिमा माँ गंगा की

महिमा माँ गंगा की

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कल कल गीत सुनाती गंगा,
छल छल बहती जाती गंगा।
गाँव, खेत, मैदान, नगर, वन,
सबकी प्यास बुझाती गंगा।।
ये तो है पर्वत की बेटी,
नागिन-सी घाटी में लेटी।
वर्षा ऋतु में यही बाढ़ बन,
सब विनाश कर जाती गंगा।।
धोती पाप, ताप सब हरती,
हरी-भरी करती है धरती।
दर्शन-मज्जन-पान मात्र से,
मन-पावन कर जाती गंगा।।
करती पथ की भूमि उर्वरा,
भरती जीवन में नई त्वरा।
पग-पग इसके घाट तीर्थ हैं,
जन-जन को ललचाती गंगा।।
कहती क्या सुनो माँ गंगा,
मैं गंगा…
इस धरा को पतित पावन बनाती,
लोगों के अनगिनत पापों को धुलाती,
सबके मुँह से गंगा ‘मां’ कहाती,
लेकिन मैं ख़ुद हर रोज़
शहर की गन्दगी से नहाती।
मैं गंगा…
इस धरा को पतित पावन बनाती,
आदि शिव की जटाओं से आती,
तरु और तृणों की प्यास बुझाती,
लेकिन क्यों सबकी गंदगी मैं बहाती?
मैं गंगा…
लोग मेरे अस्तित्व को पूजते,
मुझसे अपने भूमि को सींचते,
अंततः राख बन मेरे साथ बह जाते,
लेकिन क्यों मेरे आंसुओ को नहीं देख पाते?
कल-कल गीत सुनाती गंगा,
छल-छल बहती जाती गंगा।
गाँव, खेत, मैदान, नगर, वन,
सबकी प्यास बुझाती गंगा।।
कल कल गीत सुनाती गंगा,
ये तो है पर्वत की बेटी,
नागिन-सी घाटी में लेटी।
वर्षा ऋतु में यही बाढ़ बन,
सब e-भरी करती है धरती।
दर्शन-मज्जन-पान मात्र से,
मन-पावन कर जाती गंगा।।
करती पथ की भूमि उर्वरा,
भरती जीवन में नई त्वरा।
पग-पग इसके घाट तीर्थ हैं,
जन-जन को ललचाती गंगा।।
-डॉ दक्षा जोशी
अहमदाबाद
गुजरात ।