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समर्पण की बात

समर्पण की बात

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समर्पण की बात

“ समर्पण की बात “
अपनी ये बूंद ले के
कहां घूमते रहें,
सागर में जा मिलें,
ऐसी बरसात है।।
मैं और तुम,कभी तो
अब हम से जा मिलें,
तनहाई कहां इतनी आबाद‌ है।।
सूरज ये ,चांद,नीर और
ये डोलती पवन,
कैसे ये सबक़े वास्ते,
खुलती किताब‌ है ।।
बेशक हैं कहीं दूर,
नज़रों से भी ओझल,
पर दिल में वो बैठे हैं,
यही साथ हैं।।
तुम जीतते ही जाओ,
जो खेलो कभी,
अपनी तो जीत है वही
जब मात है।।
क्या उससे अलग हो के भी
अपना वजूद है?
आदि भी वही,
अंत वही, वही नाबाद है।
ख़ुद की न कुछ बिसात हो
तो बात है,
वो दिन को कहे रात है,
तो रात है।।
वो डूबने को कहे,
तो ख़ुद को छोड़ दें हम
दरिया भी है वही,
वही तो पात है ।
यही को अपने
समर्पण की बात है ।

  • डॉ दक्षा जोशी
    अहमदाबाद
    गुजरात ।