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सीता के राम

सीता के राम

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सीता के राम

“सीता के राम “

स्वयं से, स्वयंवरा बनने का
यह सफर आसान न था।
मैं से, जगतजननी बनने का
यह सफर आसान ना था।
मर्यादाओं में तो बन्धे श्रीराम थे,
पर मर्यादाओं को निभाना भी कहाँ आसान था ?
पथ दिखाया है जो प्रभु ने,
चलना उस पर धर्म था।
पुष्प हो या अग्निपथ,
चलना उनको निष्काम था।
दासी जिनकी रानियों सा
जीवन करती थी बसर,
उस तीनों लोकों की स्वामिनी को वन में जीवन बिताना
कहाँ आसान था?
कष्ट इतने में रूकते कहाँ है,
फ़िर वन से हरण उनका हो गया।
राजसी वैभव जिसने था छोड़ा,
उसे मृग का मोह कैसे हो गया?
जो सरल थी नीर सी,
वो बाल हठ क्यों कर गयी?
स्वामिनी बैकुंठ लोक की,
कालचक्र मे क्यों फ़ंस गयी?
राजा राम का श्रीराम बनने का यही संयोग था।
चल पड़ी सीता हरण हो,
एक पथ प्रदर्शक की तरह।
स्वर्ण लंका थी जिनके लिए
अति तुच्छ सी।
ऐसी पतिव्रता को रावण
चला था मोहने।
फ़िर जीवन बिताया योगीनी का,
जो बना आर्दश है।
जब नहीं थी आस कोई,
तब भी संकल्प अड़िग
पर्वत सा रहा।
सहारा लेकर एक तिनके का,
दशानन का अभिमान भंजन करती रही।
फ़िर बनी साक्ष्य समय की,
जब रावण जर संग चल पड़ा ।
स्थापना हुई धर्म की,
जिस धरा पर पग उनका था पड़ा
आ गयी थी जानकी अब,
अयोध्या के राज्य में।
जल रहे थे दीप हर ओर,
हर्ष और उल्हास में।
त्याग और बलिदान को जैसे यह जीवन था बना,
जल्द आ गया वह दिन भी,
जब अग्निपथ पर चलना पङा।
मर्यादा पुरूषोत्तम तो बन गये श्रीराम थे,
पर मर्यादाओं की आग में चल रहा कोई और था।
मैं से, जगतजननी बनने का
यह सफर,
सच में कहाँ आसान था?!
-डॉ दक्षा जोशी
अहमदाबाद
गुजरात ।