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हमारे पर्व

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“हमारे पर्व”

आठ वार और नौ त्योहार। देश में सदियों से यह कहावत प्रचलित है, जिसका अर्थ होता है, मौज-मस्ती भरा जीवन जीना। आख़िर पर्व और उत्सव आनंद व उल्लास के पर्याय ही तो हैं। ईश्वर से हमारी सारी प्रार्थनाएं, जीवन में हमारे तमाम जतन इसी प्रसन्नता की प्राप्ति के लिए होते हैं। और यह सब मिलता है कुछ ख़ास दिनों में।
सवाल उठता है कि क्यों कुछ विशेष दिनों में हम प्रफुल्लित रहते हैं। आख़िर उन दिनों में ऐसा क्या होता है, जो हमारे मन और माहौल में रंग और तरंग भर देता है? जवाब है- जो कुछ भी होता है, हमारे मन और जतन में होता है। हम उत्सव मनाते हैं, पर उस दिन को उत्सव भी हम ही बनाते हैं। मनाने के लिए बनाना ज़रूरी है। और चूंकि बनाना हमारे ही हाथ है, इसलिए हम अपने हर दिन को उत्सव बना सकते हैं।
बात इतनी-सी ही है। सरल और सहज सम्भाव्य। कोई जादुई मंत्र नहीं। आपको केवल वही करना है, जो आप पहले से करते आए हैं।
पहले सोचिए कि त्योहार मनाने के लिए आप क्या करते हैं। तैयारी करते हैं।
त्योहार छोटा हो या बड़ा, तैयारी अनिवार्य है। ऐसा कभी नहीं होता कि दिवाली की सुबह आप जागें, फिर तैयारियां शुरू करें। जितना बड़ा त्योहार, उतनी अधिक तैयारी। यही हमारे उत्सव की बुनियाद है। तैयारी में शामिल है योजना, यानी क्या करना है, कैसे करना है, कौन-सा काम कब तक कर लेना है। ग़ौर करें कि तैयारी शुरू होने के साथ ही उत्सव आरम्भ हो जाता है। मन में आशा और उत्साह का संचार होता है तथा वह उस विशेष अवसर के सपने बुनने लगता है।
तैयारी का ही एक अहम हिस्सा है, बचत।
हर उत्सव में अतिरिक्त ख़र्च होता है। चाहे वह फूलों की लड़ियों पर हो या विशेष भोग पर, प्रत्येक उत्सव के साथ ख़र्च भी जुड़ा है। चूंकि यह सामान्य ख़र्च के अलावा होता है, इसलिए इसके लिए हम बजट बनाते हैं और बचत करते हैं। यदि बजट और बचत न हो, तो पर्व आनंद के बजाय सिरदर्द का सबब बन जाएंगे।
तैयारी का ही एक अंग है, साज-सज्जा।
यह रंग-रोगन करने, पर्दे बदलने और रोशनी की झालर लगाने तक सीमित नहीं है। इसका असल तात्पर्य है, स्वच्छता और व्यवस्था। अगर बिस्तर अस्त-व्यस्त हो, कपड़े यहां-वहां पड़े हों, चीज़ें घरभर में बिखरी हों और फर्श पर धूल जमी हो, तो क्या त्योहार की अनुभूति हो सकती है? इसीलिए हर त्योहार पर हम घर को साफ़-स्वच्छ करते हैं, जमाते हैं।
इसके बाद क्रम है, अपनी देखभाल का।
पर्वों पर स्नान आवश्यक होता है। हर पर्व पर नए कपड़े भले ही न पहने जाएं, किंतु धुले और सजीले कपड़े तो पहने ही जाते हैं। महिलाएं ख़ुद संवरती हैं। बच्चों को अच्छी तरह तैयार किया जाता है। परिवार के सारे लोग उस दिन सुबह जल्दी उठने का प्रयास करते हैं। यदि देर तक सोते रहेंगे, तो उमंग आधी ही रह जाएगी।
त्योहार यानी अपनों का साथ भी है।
पर्व की तैयारी अकेले नहीं होती। प्रसाद-भोग की व्यवस्था, सजावट आदि में छोटे-बड़े सभी सदस्य हाथ बंटाते हैं। भजन-पूजन के साथ ही भोजन भी साथ-साथ ही होता है। बहुत सारे त्योहारों पर हम नाते-रिश्तेदारों, पड़ोसियों और अन्य प्रियजनों से मेल-मिलाप भी करते हैं।
त्योहारों का अध्यात्म, पूजा-पाठ, प्रार्थना और दान-पुण्य से अटूट नाता है।
आप आरती करते हैं, प्रार्थना करते हैं, भजन गाते हैं, ध्यान लगाते हैं, मंदिर जाते हैं, छोटा ही सही, पर कुछ दान करते हैं।
मनोदशा के योगदान को भी मत भूलिए।
त्योहार वाले दिन मन आनंदम् की अवस्था में रहता है। आप दूसरों की छोटी-मोटी ग़लतियों को अनदेखा कर देते हैं। विवाद टालने की कोशिश करते हैं। हंसते-हंसाते हैं।
त्योहारों को समाज के सभी वर्गों के साथ मनाने से सामाजिक एकता में प्रगाढ़ता आती है । इसी प्रकार हमारे कुछ राष्ट्रीय पर्व जैसे गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस, बाल दिवस, शिक्षक दिवस व गाँधी जयंती को सभी धर्मों, जातियों व संप्रदायों के लोग मिल-जुल कर ख़ुशी से मनाते हैं ।
त्योहारोंको मनाने की विधियों में जो विकृतियाँ आ गई हैं, यथा – मदिरापान, जुआ खेलना, धार्मिक उन्माद उत्पन्न करना, ध्वनि प्रदूषण व वायु प्रदूषण को बढ़ावा देना, उन्हें शीघ्रातिशिघ्र समाप्त करना होगा । हम त्योहारों को उनकी मूल भावना के साथ मनाएँ ताकि सुख-शांति में वृद्धि हो सके ।
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, जो कुछ सामाजिक बंधनों और रिश्तों की सुनहरी डोर से बंधा हुआ है। व्यक्ति संपूर्ण जीवन व्यस्त रहता है इन सबसे कुछ राहत पाने तथा कुछ समय हर्षोल्लास के साथ, बिना किसी तनाव के व्यतीत करने के लिये ही मुख्यतः पर्व एवं त्योहार मनाने का प्रचलन हुआ। इसीलिये समय-समय पर वर्षारंभ से वर्षांत तक वर्षपर्यन्त कोई न कोई त्योहार मनाये जाते हैं।
जनवरी-फरवरी में वसंत पंचमी, मार्च में होली, अप्रैल में नवरात्र, जुलाई अगस्त में शिव पूजन, सितंबर में ऋषि पंचमी, हरतालिका तीज, अक्तूबर में शारदीय नवरात्र, करवाचैथ, दशहरा, नवंबर में दीपावली तथा दिसंबर में बड़ा दिन तथा नववर्ष भी आधुनिक समय में एक पर्व के रूप में ही मनाया जाने लगा है। पर्वों को मनाने के कई कारण हैं जिनमें से एक मुख्य कारण यह भी है कि इन विभिन्न पर्व एवं त्योहारों के माध्यम से हमारी सांस्कृतिक एवं धार्मिक परंपरा की अविरल धारा निर्बाध गति से सदैव प्रवाहित होती रहे। हिंदुओं के मुख्य पर्व- होली, दीपावली, रक्षा बंधन, दशहरा, करवा चैथ नवरात्र इत्यादि सभी किसी न किसी धार्मिक मान्यताओं से जुड़े हैं।
इन सभी पर्वों का धार्मिक महत्व तो है ही साथ ही वैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी इनकी उपयोगिता कुछ कम नहीं है। विशेष पर्व अथवा त्योहारों पर अपना साफ सुथरा एवं सुसज्जित घर देखकर हमारा तन-मन भी पुलकित हो जाता है। स्वच्छ निर्मल मन से स्वस्थ एवं सुगंधित वातावरण में की गई पूजा-उपासना भी पूर्ण सफल होती है। ऐसे निर्मल वातावरण में जब हम ईश्वर के साथ एकाकार होने का प्रयत्न करते हैं तो हमें अनुभव होता है कि किसी सीमा तक हम ईश्वर का दर्शन भी कर पा रहे हैं क्योंकि यदि हमारा तन-मन प्रफुल्लित एवं आनंदित है तो यह भी एक प्रकार से हम पर ईश्वर का आशीर्वाद ही है। इन्हीं पर्व एवं त्योहारों के कारण हम अपने प्रिय जनों, मित्रों एवं रिश्तेदारों से मिलकर कुछ समय के लिये सभी तनावों को भुलकर अपना सुख-दुख बांट लेते हैं तथा अपनों के प्रेम एवं स्नेह जल से अभिषिक्त होकर आनंदित एवं आह्लादित हो जाते हैं और एक बार पुनः नव चेतना एवं शारीरिक ऊर्जा का अनुभव करते हैं जो हमें वर्षपर्यन्त प्रसन्न व स्वस्थ बनाये रखते हैं।
अतः यह सुनिश्चित है कि विविध पर्व एवं विभिन्न त्योहार हमारे जीवन में सामाजिक, धार्मिक, वैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक सभी दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं और हमें हमारी धार्मिक परंपरा एवं संस्कृति से जोड़े रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
-डॉ दक्षा जोशी
अहमदाबाद
गुजरात ।